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हम हमारे लिए

मनुष्य के जीवन की यात्रा लगातार चलती रहती है | इस यात्रा के दौरान उसे कई तरह के पडावों को पार करना पडता है, कई मुसिबतों का सामना करना पडता है साथ साथ कई तरह के सुख भी उसे भोगने के लिए मिलते है |
जब हम दिल्ली से कश्मिर की ओर चलते है तो हमे कई तरह के प्रदेश देखने को मिलते है जैसे कि सुजलाम सुफलाम कहलाने वाला हरयाना तथा पंजाब, पहाडियों तथा पर्वतों की पहचान करवानेवाला जम्मू |
पर्वत की कतारों मे कई तरह के मोड पार करने के बाद दिखाई देनेवाला एक सृष्टी की अनुपम सुंदरता, फूल, फल और यदि हमारा सफर उसी तरह चलता रहे तो आगे सामने आनेवाला अकेलापन और अंत मे आकाश के वस्त्र को धारण करनेवाला लंबा चौडा प्रदेश तथा लंबी रातें और अकेलापन |
हमारे जीवन मे ही इसी तरह के कई पडाव होते है | यदि हम हमारा आखरी पडाव सुखदायी करना चाहते है तो हमे शुरुआत से ही हमारे जीवनरेखा को इस तरह खींचना होगा कि यह अकेलापन हमारे जीवन मे आये ही नही | हमे ऐसी योजना को निर्धारित करना होता है कि हम सदा सुख मे ही रहें | उस योजना को हम कह सकते है “हम हमारे लिए” | इसी तत्वज्ञान का हमे अनुसरण करना होगा | हमारी परिस्थिती के साथ समझौता करके हमे हमारी चारों ओर केवल आनंद ही फैलाना होगा |
बचपन मे मां पिता के द्वारा मिलनेवाला लाडप्यार जिनके कारण हमारी सुजलाम सुफलाम जिंदगी यह है हमारे जीवन का पहला पडाव |
उसके बाद शुरु होता है शिक्षा का मुश्किल घाट | इस दौरान हमे कई तरह की परिक्षाओं का सामना करना होता है और इस घाट को पार करना होता है | इस मोडपर हमे थकान का भी अनुभव होता है लेकिन मनमे एक अशा होती है कि हमारी जिंदगीमे कुछ अच्छा होनेवाला है जिसे दूसरे शब्दों मे कहा जायेगा ब्रह्मचर्याश्रम |
इस मुश्किलों से भरे मोडको पार करनेपर हमारे सामने आता है गृहस्थ आश्रम जिसमे हमे काम करना और पैसा कमाना यह प्रमुख कार्य करना होता है | इस आश्रम मे हम सुखों का उपभोग करना, विवाह करना, बच्चों का लाडप्यार से पालन करना इन सब बातों के बीच समय किस तेजी से आगे बढ जाता है इस बातका हमे पता भी नही चलता | मनुष्य इस गृहस्थ आश्रम के बीच पूरी तरह खो जाता है | इसी समय के दौरान मनुष्य की सांपत्तिक तथा भौतिक प्रगती भी होती है |
जीवन आगे बढता जाता है | बच्चे बडे होते है | उनके भी नये परिवार बनते है | उसी समय हमारे शरीरपर बुढापे के चिन्ह दिखाई देने लगते है | यही समय होता है हमारे सामने जो परिस्थिती है उसका स्वीकार करने का |
हमारे आनेवाले भविष्य का इंतजाम करने के बाद धीरे धीरे पारिवारिक जिम्मेदारियों से बाहर निकलने का यह समय होता है जब हमारे दायित्वों को अगली पीढि को सौंपकर हमे व्यावहारिक जीवन से हट जाने का यह समय होता है |
वैसे कहा जाये तो जीवन का यह समय बडा ही कठिन होता है | मनुष्य को माया, मोह, काम, क्रोध, लोभ, मत्सर इन छह विकारों से आसानी से मुक्ती पाना संभव नही हो सकता | इसका परिणाम यह होता है कि मनुष्य ना चाहत हुए विभिन्न रिश्तों के बीच फंस जाता है |
बचपन मे हमने एक बंदर की कहानी कहीं से सुनी थी | उस बंदर को पकडने का आसान उपाय यह होता है कि एक छोटे मुखवाले बरतन मे खाने की चीज रख दी जाती है | उस खाने की चीज के लिए बंदर उसमे अपना हाथ डालता है वह चीज मुठ्ठी मे भर लेता है लेकिन भरी मुठ्ठी को उस बरतन के मुखसे बाहर निकाला नही जा सकता | यदि वह मुठ्ठी को खोल दें तो वह उस बरतन से मुक्त हो सकता है लेकिन भरी मुठ्ठी का मोह उससे छूटना नही | नतिजा यह होता है कि इसी लोभ के कारण वह फंस जाता है | हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही होता है|
यह समय होता है अपनी बुद्धी की शक्ति के सहारे अपने मन पर विजय प्राप्त करने का | हमे अपने बच्चों के कामों मे, उनके पारिवारिक जीवन मे उलझना नही चाहिए | हमे लगता है कि वह गढे मे जा रहा है और उसका नुकसान होगा लेकिन फिर भी हमारी भूमिका केवल सलाहगार की ही होनी चाहिए |
यदि वह हमसे पूछे तो उसे उचित सलाह देनी चाहिए | इसी को धीरे धीरे वानप्रस्थ का स्वीकार करना भी कहा जायेगा |
इसी समय मे मनुष्य बुढापे की तैयारी की हालत मे होता है | अपना स्वास्थ्य, अपनी संपत्ती, घूमना फिरना या किसी भी बात के लिए वह पराधीन नही होता है| यही वह समय है जब हमे आगे चलकर मिलनेवाली साथ, सांपत्तिक स्थिती, रिश्ते नाते टूटना या उनकी ओर दुर्लक्ष होनेके लिए भी तैयार रहना पडता है | यह बात हदसे ज्यादा न बिगडे इस के लिए उचित ध्यान भी रखना पडता है और उसके लिए उचित योजना भी बनानी पडती है |
इसलिए हम भविष्य मे होनेवाली घटनाएँ तथा उनके लिए आज जो भी संभव है वह तैयारी इसका विचार करना चाहिए | इसलिए कहते है कि हम हमारे लिए |
 

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